शिरोमणि वीर चौधरी गोकुला सिंहजी
शिरोमणि वीर चौधरी गोकुला सिंहजी
•चौधरी गोकुला सिंहजी वो नाम जिसें औरंगजेब की सत्ता को हिला दिया था। ,वीर गोकुला सिंहजी से निपटने के लिए औरंगजेब को स्वयं दिल्ली से चलकर मथुरा आना पड़ा था
चौधरी गोकुला सिंहजी इनका जन्म एक जमींनदारी परिवार में हुआ था, सिंह बचपन से मुगल सत्ता के खिलाफत में रहे थे ,वैसे तो बृज के क्षत्रिय जाट मुगलों को लगान नहीं दिया करते थे ,पर औरंगजेब के शासनकाल में लगान, हिंदूमंदिरों को तोडना,हिंदूओं को चुन-चुन कर मारना ! इसके विरोध में चौधरी गोकुला सिंहजी ने जाटों की सेना तैयार की व मुगल सेना को समय-2 पर चुनौती के साथ-साथ युद्ध भी हराये ! साथ ही छोटे-बडे युद्ध बाद पाँच माह तक होते रहे। सन् 1669 में औरंगजेब इतना तंग हो गया कि उसने चौधरी गोकुला सिंहजी से निपटने के लिए औरंगजेब को स्वयं दिल्ली से चलकर मथुरा आना पड़ा था !
मुगल शासक को किसी भी प्रकार की मालगुजारी देने के दुबारा दुत को भेजा पर गोकुला सिंहजीने मना कर दिया था,तिलमिलाए औरंगजेब के आदेश पर मुगल फौज ने तिलपत गढ़ी पर हमला कर दिया। फिर 1669 में मुगल फौज और क्षत्रिय जाट फौज के बीच तिलपत का युद्ध हुआ,हल्दी घाटी का युद्ध और पानीपत की तीन लड़ाइयां एक दिन में ही समाप्त हो गई थी,लेकिन तिलपत का युद्ध तीन दिन तक चला था। यह युद्ध 20000 जाट सेना व 1,00,000 से अधिक मुगल सेना के बीच था !10 मई 1666 को तिलपत की लड़ाई में वीर गोकुला सिंह ने औरंगजेब को हरा दिया।इसके बाद पाँच माह तक भयंकर युद्ध होते रहे। मुगलों में गोकुल सिंह का वीरता और युद्ध संचालन का आतंक बैठ गया। अंत में सितंबर मास में, बिल्कुल निराश होकर, शफ शिकन खाँ ने गोकुलसिंह के पास संधि-प्रस्ताव भेजा। उसने कहा कि माफी मांग लें। गोकुल सिंह ने कहा कि मैंने कोई अपराध नहीं किया है, इससिए माफी क्यों मागूं। इससे औरंगजेब तिलमिला गया। वह 28 नवम्बर, 1669 को दिल्ली से मथुरा आ गया। युद्ध की तैयारिया शुरू हो गईं। दिसम्बर, 1669 के अंतिम सप्ताह में तिलपत से 20 मील दूर सिहोर में दूसरा युद्ध हुआ। मुगलों के पास तोपखाना थी, फिर भी जाट वीर लड़ते रहे। तीन दिन तक युद्ध हुआ। शाही सेना के पैर उखड़ गए। जाट जीतने ही वाले थे थे कि हसन अली खाँ के नेतृत्व में नई मुगल फौज आ गई। जाटों के पैर उखड़ गए, लेकिन वे अपने घरों की ओर भागे नहीं, तिलपत गढ़ी में आ गए। यहां फिर तीन दिन तक युद्ध चलता रहा। मुगलों की तोपों ने सबकुछ नष्ट कर दिया। गोकुल सिंह, उनके चाचा उदय सिंह और अन्य वीरों को बंदी बना लिया गया।
आगरा किले में औरंगजेब ने वीर गोकुला जाट ते सामने शर्त रखी कि जान की सलामती चाहते तो इस्लाम धर्म स्वीकार कर लो। गोकुल सिंह ने वीरतापूर्वक इनकार कर दिया। फिर एक जवनरी, 1670 को गोकुल सिंह, उनके चाचा उदय सिंह और अन्य को बंदी बनाकर कोतवाली के चबूतरे पर लाया गया। गोकुल सिंह को जंजीरों में जकड़ा हुआ था। उनके शरीर का एक-एक अंग काटा गया। हजारों की भीड़ के सामने यह कुकृत्य किया गया ताकि लोग डरें। इसके बाद भी उन्होंने दासता स्वीकार नहीं की, इस्लाम धर्म स्वीकार नहीं किया। उदय सिंह की तो खाल खिंचवा ली गयी, लेकिन धर्म नहीं छोड़ा। गोकुल सिंह इतने शक्तिशाली थे कि जब कोई अंग कुल्हाड़ी से काटा जाता तो रक्त के फव्वारे छूटते थे। जनता में हाहाकार मचा हुआ था, लेकिन किसी में विरोध की हिम्मत नहीं थी। आगरा में गोकुलसिंह का सिर गिरा, उधर मथुरा में केशवरायजी का मन्दिर। जहां वीर गोकुला सिंह बलिदान हुए, उसी स्थान का नाम फव्वारा है। फव्वारा में मुख्य रूप से दवा बाजार है। यहीं पर कोतवाली है। चौधरी गोकुला सिंहजी का बलिदान मुगल शासन के ताबूत में अंतिम कील के रूप में सिद्ध हुआ।