हिन्दी उपन्यास का विकास

                         

        ’उपन्यास’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- उपन्यास। ’उप’ का अर्थ है-समीप और ’न्यास’ का अर्थ है – रखना। अर्थात् उपन्यास का शाब्दिक अर्थ है – समीप रखना या मनुष्य के समीप रखी हुई वस्तु। अतः वह कृति जिसे पढ़कर लगे कि वह हमारे ही जीवन का प्रतिबिम्ब है।
        हिन्दी उपन्यास का आधुनिक स्वरूप यूरोपीय साहित्य से पूर्णतः प्रभावित है, जिसका सूत्रपात आधुनिक युग में हुआ। हिन्दी का प्रारंभिक उपन्यास साहित्य अंग्रेजी तथा बांग्ला से प्रभावित था।

हिन्दी का प्रथम उपन्यास

 विद्वान   उपन्यासकार   उपन्यास   प्रकाशन वर्ष
 डाॅ. गोपाल राय 

डाॅ. विजयशंकर मल्ल
आचार्य रामचंद्र शुक्ल 
पं. गौरीदत्त 

श्रद्धाराम फिल्लौरी 

श्री निवासदास 

देवरानी जेठानी की कहानी
भाग्यवती 
परीक्षा गुरु

1870
1877
1882

मुंशी प्रेमचंद को यदि हिंदी उपन्यास का केन्द्र बिन्दु माना जाए तो हिंदी उपन्यास को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है:-

(1) प्रेमचंद पूर्व हिंदी उपन्यास
(2) प्रेमचंद युगीन हिंदी उपन्यास
(3) प्रेमचंदोत्तर हिन्दी उपन्यास
 
1. प्रेमचंद पूर्व उपन्यास

                                                                सामाजिक उपन्यास

 उपन्यासकार  

ऐतिहासिक उपन्यासकार
1. किशोरीलाल गोस्वामी
(1) हृदयहारिणी व आदर्श रमणी (1890) (2) तारा (1902) (3) राजकुमारी (1902) (4) कनक कुसुम व मस्तानी (1903) (5) लखनऊ की कब्र व शाही महलसरा (1918) (6) सुल्ताना रजिया बेगम प रंग महल में हलाहल
2. गंगा प्रसाद गुप्त
(1) पृथ्वीराज चैहान (1902) (2) कुँवर सिंह सेनापति (1903) (3) हम्मीर (1904)
3. जयराम गुप्त
(1) कश्मीर पतन (1907) (2) मायारानी (1908) (3) नबावी परिस्तान व वाजिद अली शाह (1908) (4) कलावती (1909)
4. रामनरेश त्रिपाठी
(1) वीरांगना (1911)
5. ब्रजनंदन सहाय
(1) प्रेमचंद सम्पूर्ण कहानियाँ
(2) लालचीन (1916)
(3) वीरमणि (1917)
तिलस्मी-ऐयारी उपन्यास
हिंदी में ’तिलस्मी ऐयारी’ उपन्यासों के प्रवर्तक बाबू देवकीनंदन खत्री (1861-1913) है।
पं. रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार:-
’’पहले मौलिक उपन्यास लेखक जिनके उपन्यासों की सर्व-साधारण में धूम हुई, काशी के बाबू देवकीनंदन खत्री थे।’’
1. बाबू देवकीनंदन खत्री के प्रमुख उपन्यास:-
(1) चंद्रकांता संतति – 24 भाग (1899) (2) नरेन्द्र मोहिनी (1893) (3) वीरेन्द्र वीर (1895) (4) कुसुमकुमारी (1899) (5) भूतनाथ (अधूरा)
प्रदीप सक्सेना ने प्रमाणित किया है कि ’’चंद्रकांता यथार्थवाद के प्रथम उत्थान का महाकाव्य है।’’

बाबू देवकीनंदन खत्री के पुत्र बाबू दुर्गाप्रसाद खत्री (1895) ने भूतनाथ उपन्यास को पूरा किया और रोहतासमठ नामक मौलिक उपन्यास लिखा।
हरिकृष्ण जौहर के प्रमुख ऐयारी उपन्यास
(1) कुसुम लता (1899) (2) भयानक भ्रम (1900) (3) नारी पिशाच (1901) (4) मयंक मोहिनी या माया महल (1901) (5) जादूगर (1901) (6) कमल कुमारी (1902) (7) निराला नकाबपोश (1902) (8) भयानक खून (1903) आदि।

अन्य प्रमुख उपन्यासकार एवं उपन्यास
  • देवीप्रसाद उपाध्याय
  • गुलाबदास
  • विश्वेश्वर प्रसाद वर्मा
  • रामलाल वर्मा सुंदर सरोजिनी (1893)
  • तिलस्मी बुर्ज
  • वीरेन्द्र कुमार (1906)
  • पुतली का महल (1908)
  • जासूसी उपन्यास(हिन्दी उपन्यास का विकास )
 उन्नीसवीं शती में अंग्रेजी में सर आर्थर कानन डायल (1859-1930) के जासूसी उपन्यास बहुत लोकप्रिय हुए।
⇒ हिंदी में जासूसी उपन्यास का प्रवर्तन गोपालराम गहमरी (1866-1946) ने किया।
 सन् 1898 में गोपालराम गहमरी ने बंग्ला से ’हीरे का मोल’ उपन्यास अनूदित कर प्रकाशित कराया।
⇒ गोपालराम गहमरी ने 1900 ई. में ’गहमर’ से ’जासूस’ नामक मासिक पत्रिका निकाली।
 गोपालराम गहमरी को हिंदी का ’कानन डायल’ कहा जाता है।
⇒ गहमरी जी ने 200 से ज्यादा जासूसी उपन्यास लिखें। इनके प्रमुख उपन्यास निम्नलिखित हैं:-
(1) अद्भुत लाश (1896) (2) गुप्तचर (1899) (3) बेकसूर की फाँसी (1900) (4) सरकटी लाश (1900) (5) खूनी कौन (1900) (6) बेगुनाह का खून (1900) (7) जमुना का खून (1900) (8) डबल जासूस (1900) (9) मायाविनी (1901) (10) चक्करदार चोरी (1901) (11) जासूस की भूल (1901) (12) भयंकर चोरी (1901) (13) जादूगरनी मनोला (1901) (14) जासूस पर जासूसी (1904) (15) इन्द्रजालिक जासूस (1910) (16) भोजपुर की ठगी (1911) (17) गुप्त भेद (1913) (18) जासूस की ऐयारी (1914) आदि।
अन्य प्रमुख जासूसी उपन्यासकार
1. रामलाल वर्मा
(1) चालाक चोर (2) जासूस के घर खून (3) जासूसी कुत्ता (4) अस्सी हजार की चोरी
2. किशोरीलाल गोस्वामी
(1) जिंदे की लाश (1906)
 
3. जयरामदास गुप्त
(1) लंगङा खूनी (1907) (2) काला चाँद
4. रामप्रसाद लाल
(1) हम्माम का मुर्दा (1903)
 
घटना प्रधान उपन्यासों के महत्त्वपूर्ण उपन्यासकार एवं उनकी रचनाएँ
  1. अंबिकादत्त व्यास – (1) आश्चर्य वृत्तांत (1893)
  2. प्रेम विलास वर्मा –  (1) प्रेममाधुरी या अनंगतकांता (1915)
  3. विट्ठलदास नागर – (1) किस्मत का खेल (1905)
  4. बाॅकेलाल चतुर्वेदी – (1) खौफनाक खून (1912)
  5. दुर्गाप्रसाद खत्री- (1) प्रतिशोध (1925) (2) लाल पंजा (1925) (3) रक्तमण्डल (1927)
अन्य प्रमुख उपन्यासकार एवं उपन्यास
  1. राधाचरण गोस्वामी-  (1) सौदामिनी (1891)
  2. कुुंवर हनुमंत सिंह -(1) चंद्रकला (1893)
  3. ब्रजनंदन सहाय – (1) राजेन्द्र मालती (1897) (2) अद्भुत प्रायश्चित (1901) (3) अरण्यबाला (1915)
  4. अवध नारायण – (1) विमाता (1916)

प्रेमचंद युगीन हिंदी उपन्यास(हिन्दी उपन्यास का विकास )
 
  प्रेमचंद युग की मर्यादा 1918 से 1936 ई. तक मान्य है। हिंदी साहित्य में यह ’युग’ छायावाद के नाम से प्रसिद्ध है।
छायावाद अपनी समस्त दुर्बलताओं के बावजूद नव-जागरण का युग था। भावावेग, आदर्शप्रियता, राष्ट्रीयता भावना,
स्वच्छदता आदि प्रवृत्तियाँ नवजागरण की ही सूचना देने वाली थी। इन प्रवृत्तियों से प्रेमचंद भी प्रभावित हुए। 

उपन्यास के बारे प्रेमचंद ने कहा है:-
’’मैं उपन्यास को मानव-जीवन का चित्र मात्र समझता हूँ। मानव जीवन पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को
खोजना ही उपन्यास के मूल तत्त्व है।’’
प्रेमचंद ’मानवतावाद’ से भी प्रकाशित थे। उन्होंने ’जीवन में साहित्य का स्थान’ विषय पर विचार करते हुए लिखा है:-
’’आदि काल से मनुष्य के लिए सबसे समीप मनुष्य है। हम जिसके सुख-दुख, हँसने-रोने का मर्म समझ सकते है, उसी से हमारी आत्मा का अधिक मेल होता है।’’
जीवन के अंतिम दिनों में प्रेमचंद की आदर्शवादी आस्था हिल उठी थी। सेवासदन (1918) ई. से लेकर गोदान (1936) ई. तक आते-आते भीतर ही भीतर उनके विचारों में क्रांतिकारी परिवर्तन हो चुके थे। गोदान (1936) तक आते-आते प्रेमचंद का आदर्शान्मुख यथार्थवाद, यथार्थोन्मुख आदर्शवाद बन गया है।
प्रेमचंद का ’गोदान’ एक ऐसी मनोभूमि पर प्रतिष्ठित है,
जहाँ जैनेन्द्र की आत्मकेन्द्रित अंतर्मुखी पीङा, इलाचंद जोशी की कामकुण्ठा-जनित जटित व्यक्ति-चेतना, यशपाल का समाजोन्मुख यथार्थवाद, भगवतीचरण वर्मा और उपेन्द्रनाथ ’अश्क’ का रूमानी समाजोन्मुखी व्यक्तिवाद तथा अमृतलाल नागर का सर्व-मांगलिक मानववाद सभी के प्रेरणा-सूत्र लक्षित किये जा सकते हैं। प्रेमचंद युग के अंतिम चरण में उपर्युक्त सभी प्रवृत्तियों का उन्मेष हो चुका था।
 मुंशी प्रेमचंद (1880-1936) ई. का मूलनाम धनपत राय था। किंतु वे ’उर्दू’ में ’नबावराय’ के नाम से लिखते थे।
⇒ धनपत राय को ’प्रेमचंद’ नाम उर्दू के लेखक दयानारायण निगम ने दिया था।
 उनको ’कथा सम्राट’ की संज्ञा बंग्ला कथाकार शरतचन्द्र चटोपाध्याय ने दिया था।
⇒ प्रेमचंद का प्रथम प्रौढ़ उपन्यास सेवासदन (1918) ई. है। इस उपन्यास में सामाजिक अत्याचार से पीङित नारी समाज और वेश्यावृत्ति की समस्या को आधार बनाया गया है।

 उनके प्रारंभिक उपन्यासों का मूल रूप उर्दू में था। प्रेमचंद ने निम्नलिखित उपन्यासों का उर्दू से हिंदी में रूपांतर किया:-
                उर्दू उपन्यास                                  हिंदी में रूपांतदित उपन्यास                         वर्ष
  1. असरारे मआविद                             देवस्थान रहस्य                                             1905
  2. हमखुर्मा व हमसबाब                        प्रेमा                                                            1907
  3. बजारे हुस्न                                        सेवासदन                                                    1918
  4. जलवाए ईसार                                  वरदान                                                        1921
  5. गोशाएँ आफियत                             प्रेमाश्रम                                                       1922
  6. चैगाने हस्ती                                     रंगभूमि                                                       1925
  7. किशना                                            गबन                                                           1931
प्रेमचंद (1880-1936 ई.) हिन्दी उपन्यास का विकास
  1. प्रेमा (1907) 
  2. रूठी रानी (1907) 
  3. सेवासदन (1918) 
  4. वरदान (1921)
  5. प्रेमाश्रम (1922)
  6.  रंगभूमि (1925) 
  7. कायाकल्प (1926)
  8.  निर्मला (1927)
  9. प्रतिज्ञा (1929) 
  10. गबन (1931) 
  11. कर्मभूमि (1933)
  12.  गोदान (1936)
  13. मंगलसूत्र (अपूर्ण (1948 ई.)
 विश्वम्भर नाथ कौशिक (1891-1945 ई.) के तीन उपन्यास निम्नलिखित है –
(1) माँ (1929 ई.) – इसमें लेखक ने दिखाने की कोशिश की है कि माँ के स्नेह, त्याग और देखरेख ही बालक का विकास निर्भर हैं,
(2) भिखारिणी (1929) – अंतर्जातीय विवाह की समस्या को उठाया गया है।
(3) संघर्ष (1945) – आर्थिक विषमता के कारण प्रेम की विफलता का चित्रण
 श्री नाथ सिंह (1901-1995 ई.)
(1) उलझन (1922) (2) क्षमा (1925) (3) एकांकिनी (1927) (4) प्रेम परीक्षा (1927) (5) जागरण (1937) (6) प्रजामण्डल (1941) (7) एक और अनेक (1951) (8) अपृहता (1952)
 शिवपूजन सहाय (1893-1963)
(1) देहाती दुनिया (1926 ई.) – इसमें ग्रामीण जीवन का सुबोध और प्रभावकारी चित्रण किया गया है।
प्रेमचंद युगीन अन्य प्रमुख उपन्यासकार
                    उपन्यासकार         
  •                            उपन्यास
1. चण्डी प्रसाद ’हृद्येश’
  •   मनोरमा (1924)
  •   मंगल प्रभात (1926 ई.)
2. राधिकारमण प्रसाद सिंह 
  •   राम रहीम (1936)
  •   पुरुष और नारी (1939)
  •  संस्कार (1942)
  •  चुबंन और चांटा (1956) 
3. जी.पी. श्रीवास्तव 
  •    भङम सिंह शर्मा (1919)
  •    लतखोरी लाल (1931)
  •   विलयाती उल्लू (1932)
  •   स्वामी चैखटानंद (1936)
  •   प्रणनाथ (1925)
  •  गंगा जमुनी (1927)
  •  कल्याणी (1921)
4. मन्नन द्विवेदी 
  •     कल्याणी (1921)
5. सूर्यकांत त्रिपाठी ’निराला’ 
  •   अप्सरा (1931)
  •    अलका (1933)
  •     निरूपमा (1936)
  •    प्रभावती (1936)
  •    चोटी की पकङ, काले कारनामे (1950)
6. गोविन्द वल्लभ पंत 
  •  सूर्यास्त (1922)
  •  प्रतिमा (1934)
  • मदारी (1935)
7. भगवती प्रसाद वाजपेयी 
  •  प्रेमपथ (1926)
  • अनाथ पत्नी (1928)
  • मुस्कान (1929)
  • प्रेम निर्वाह (1934)
  •  पतिता की साधना (1936)
  •  चलते चलते (1951)
  •   टूटते बंधन (1963)
प्रकृतवाद उपन्यास
     प्रकृतवाद एक विशिष्ट जीवन दर्शन है। यह मानव जीवन को वैज्ञानिक दृष्टि से प्रकृत (नेचुरल) रूप में देखने और
चित्रित करने में विश्वास रखता है। इस विचारधारा के अनुसार जीवन में जिसे विद्रूप और कुत्सित कहा जाता है, वह
सहज और वैज्ञानिक भी है।
प्रकृतवाद (विचारधारा) उपन्यासों का जनक जोला को माना जाता है। जोला के अनुसारः- ’’लेखकों का धर्म है कि वे जीवन के गंदे और कुरूप से कुरूप चित्र खींचे। मनुष्य की दुर्बलताओं रोगों और विकृतियों का वर्णन करते समय उन्हें कोई अंश नहीं छोङना चाहिए था।
 हिंदी में प्रकृतवादी उपन्यासों का प्रर्वतक पाण्डेय बेचन शर्मा ’उग्र’ को माना जाता है।
हिंदी में प्रकृतवादी उपन्यासकार निम्नलिखित है:-
1.  चतुरसेन शास्त्री (1891-1960)
(1) हृदय की परख (1918) ई. (2) व्यभिचार (1923) (3) हृदय की प्यास (1931)
(4) अमर अभिलाषा (1933) (5) आत्मदाह (1937) वैशाली की नगर वधू (1948) (6) मंदिर की नर्तकी (1951) (7) अपराजिता (1952) (8) आलमगीर (1954) (9) सोमनाथ (1955) (10) वयं रक्षाम् (1958) (11) सोना और खून (4 भाग 1957-58) (12) सहाद्रि की चट्टानें (1959) (12) बिना चिराग का शहर (1960 ई.)
2. पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र (1900-1967)
(1) चंद हसीनों के खतूत (1924) (2) दिल्ली का दलाल (1927) (3) चाॅकलेट (1927) (4) बुधुआ की बेटी (1928) (5) शराबी (1931) (6) सरकार तुम्हारी आँखों में (1937) (7) जी जी जी (1937) (8) मनुष्यानंद (1935-बुथुआ की बेटी का रूपांतर) (9) फागुन के दिन-रात (1960) (10) जुहू (1963)
3. ऋषभचरण जैन (1912-1985)
(1) मास्टर साहब (1927) (2) दिल्ली का व्यभिचार (1928) (3) बुर्केवाली (1928) (4) वेश्या पुत्र (1929) (5) दुराचार के अड्डे (1930) (6) चाँदनी रात (1930) (7) सत्याग्रह (1930) (8) गदर (1931) (9) भाग्य (1931) (10) भाई (1931) (11) रहस्यमयी (1931) (12) मधुकरी (1933) (13) चम्पाकली (1935) (14) बुर्काफरोश (1936) (15) मंदिर दीप (1936) (16) हर हाईनेस (1938) (17) मयखाना (1938) (18) तीन इक्के (1940 ई.)
4. जयशंकर प्रसाद के प्रमुख उपन्यास:-
(1) कंकाल 1929 – इसमें प्रसाद ने समाज के त्यागे हुए, अवैध और अज्ञात कुलशील संतानों की कथा कही हैं। इस उपन्यास का विषय प्रकृतिक है किन्तु दृष्टि सामाजिक है।
(2) तितली 1934 – इसमें ग्रामीण और कृषक जीवन का वर्णन है, पूँजीपतियों द्वारा निम्नवर्ग के शोषण का वर्णन है।
(3) इरावती 1936 – यह अपूर्ण ऐतिहासिक उपन्यास है।
5.अनूपलाल मंडल के उपन्यास:-
(1) निर्वासिता (1929) (2) समाज की वेदी पर (1931) (3) साकी (1932) (4) रूपरेखा (1934) (5) ज्योतिर्मयी (1934) (6) मीमांसा (1937) (7) आवारों की दुनिया (1945) (8) दर्द की तस्वीरें (1945) (9) बुझने न पाये
 अनूपलाल मण्डल ने ’समाज की बेदी पर’ और ’रूपरेखा’ शीर्षक उपन्यास की रचना पत्रात्मक प्रविधि से की।
⇒ ’उग्र’ जी का ’बुधुआ की बेटी’ उपन्यास घोर यथार्थवादी उपन्यास है।
 ’चंद हसीनों के खतून’ पत्रात्मक प्रविधि में लिखा गया हिंदी का पहला उपन्यास है।

⇒ ’उग्र’ जी अपने साहित्य में भी उग्र रूप में ही प्रकट हुए है। डाॅ. गोपाल राय का कहना है:-
’’उग्र जी इस युग के सबसे अक्खङ और सबसे बदनाम उपन्यासकार थे

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