आदिकाल
1. आदिकाल का नामकरण-
विभिन्न इतिहासकारों द्वारा आदिकाल का नामकरण निम्नानुसार किया गया-
इतिहासकार का नाम – नामकरण
1. हजारी प्रसाद द्विवेदी -आदिकाल
2. रामचंद्र शुक्ल -वीरगाथा काल
3. महावीर प्रसाद दिवेदी -बीजवपन काल
4. रामकुमार वर्मा- संधि काल और चारण काल
5. राहुल संकृत्यायन- सिद्ध-सामन्त काल
6. मिश्रबंधु- आरंभिक काल
7. गणपति चंद्र गुप्त -प्रारंभिक काल/ शुन्य काल
8. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र- वीर काल
9. धीरेंद्र वर्मा -अपभ्रंस काल
10. चंद्रधर शर्मा गुलेरी -अपभ्रंस काल
11. ग्रियर्सन- चारण काल
12. पृथ्वीनाथ कमल ‘कुलश्रेष्ठ’- अंधकार काल
13. रामशंकर शुक्ल- जयकाव्य काल
14. रामखिलावन पाण्डेय- संक्रमण काल
15. हरिश्चंद्र वर्मा- संक्रमण काल
16. मोहन अवस्थी- आधार काल
17. शम्भुनाथ सिंह- प्राचिन काल
18. वासुदेव सिंह- उद्भव काल
19. रामप्रसाद मिश्र- संक्रांति काल
20. शैलेष जैदी – आविर्भाव काल
21. हरीश- उत्तर अपभ्रस काल
22. बच्चन सिंह- अपभ्रंस काल: जातिय साहित्य का उदय
23. श्यामसुंदर दास- वीरकाल/अपभ्रंस का
2. हिंदी का सर्वप्रथम कवि
विभिन्न इतिहासकारों के अनुसार हिंदी का पहला कवि-
1. राहुल सांकृत्यायन के अनुसार – सरहपा (769 ई.)
2. शिवसिंह सेंगर के अनुसार – पुष्प या पुण्ड (10 वीं शताब्दी)
3. गणपति चंद्र गुप्त के अनुसार – शालिभद्र सूरि (1184 ई.)
4. रामकुमार वर्मा के अनुसार – स्वयंभू (693 ई.)
5. हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार- अब्दुल रहमान (13 वीं शताब्दी)
6. बच्चन सिंह के अनुसार – विद्यापति (15 वीं शताब्दी)
7. चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ के अनुसार- राजा मुंज (993 ई.)
8. रामचंद्र शुक्ल के अनुसार- राजा मुंज व भोज (993 ई.)
नोट:- सर्व सामान्य रूप में राहुल सांकृत्यायन जी द्वारा स्वीकृत सिद्ध कवि ‘ सरहपा या सरहपाद’ को ही हिंदी का सर्वप्रथम कभी माना जाता है|
3. रास (जैन) साहित्य की प्रमुख रचनाएं
रचना – रचनाकार का नाम
- भरतेश्वर बाहुबली रास- शालिभद्र सूरि (1184 ई.)
- पांच पांडव चरित रास- शालिभद्र सूरि (14 वीं शताब्दी)
- बुद्धि रास – शालिभद्र सूरि
- चंदनबाला रास- कवि आसगु (1200 ई. जालौर)
- जीव दया रास- कवि आसगु
- स्थुलिभद्र रास- जिन धर्म सूरि (1209 ई.)
- रेवंतगिरि रास- विजय सेन सूरि (1231 ई.)
- नेमिनाथ रास- सुमित गुणि (1231 ई.)
- गौतम स्वामी रास- उदयवंत/विजयभद्र
- उपदेश रसायन रास- जिन दत्त सूरि
- कच्छुलि रास- प्रज्ञा तिलक
- जिन पद्म सूरि रास- सारमूर्ति
- करकंड चरित रास- कनकामर मुनि
- आबूरास-पल्हण
- गय सुकुमाल रास- देल्हण/देवेन्द्र सूरि
- समरा रास-अम्बदेव सूरि
- अमरारास- अभय तिलकमणि
- भरतेश्वर बाहुबलिघोर रास- वज्रसेन सूरि
- मुंजरास- अज्ञात
- नेमिनाथ चउपई- विनयचन्द्र सूरि(1200 ई.)
- नेमिनाथ चरिउ – हरिभद्र सूरि (1159 ई.)
- नेमिनाथ फागु – राजशेखर सूरि (1348 ई.)
- कान्हड़-दे-प्रबंध- पद्मनाभ
- हरिचंद पुराण -जाखू मणियार (1396 ई.)
- पास चरिउ(पार्श्व पुराण)- पदम कीर्ति
- सुंदसण चरिउ (सुदर्शन पुराण)- नयनंदी
- प्रबंध चिंतामणि – जैनाचार्य मेरुतुंग
- कुमारपाल प्रतिबोध- सोमप्रभ सूरि (1241ई.)
- श्रावकाचार – देवसेन (933 ई.
- दब्ब-सहाव-पयास- देवसेन
- लघुनयचक्र- देवसेन
- दर्शनसार- देवसेन
4. रासो साहित्य की रचनाएं
- पृथ्वीराज रासो- चंदबरदाई
- बीसलदेव रासो -नरपति नाल्ह
- परमाल रासो -जगनिक
- हम्मीर रासो – शार्ड.ग्धर
- खुमान रासो- दलपति विजय
- विजयपाल रासो -नल्लसिंह भाट
- बुद्धिरासो- जल्हण
- मुंज रासो – अज्ञात
- रासो नाम की अन्य रचनाएँ-
- कलियुग रासो- रसिक गोविंद
- कायम खाँ रासो- न्यामत खाँ जान कवि
- राम रासो- समय सुंदर
- राणा रासो- दयाराम (दयाल कवि)
- रतनरासो- कुम्भकर्ण
- कुमारपाल रासो- देवप्रभ
रासो साहित्य की प्रमुख विशेषताएं
1. यह साहित्य मुख्यतः चारण कवियों द्वारा रचा गया |
2. इन रचनाओं में चारण कवियों द्वारा अपने आश्रयदाता के शौर्य एवं ऐश्वर्य का अतिश्योक्ति पूर्ण वर्णन किया गया है |
3. इन रचनाओं में ऐतिहासिकता के साथ-साथ कवियों द्वारा अपनी कल्पना का समावेश भी किया गया है|
4. इन रचनाओं में युद्ध है प्रेम का वर्णन अधिक किया गया है|
5. इन रचनाओं में वीर व श्रंगार रस की प्रधानता है|
6. इन रचनाओं में डिंगल और पिंगल शैली का प्रयोग हुआ है|
7. इनमें विविध प्रकार की भाषाएं एवं अनेक प्रकार के छंदों का प्रयोग किया गया है|
8. इन रचनाओं में चारण कवियों की संकुचित मानसिकता का प्रयोग देखने को मिलता है|
9. रासो साहित्य की अधिकांश रचनाएं संदिग्ध एवं अर्ध प्रमाणिक मानी जाती है|
5. नाथ साहित्य
नाथ पंथ के प्रवर्तक- मत्स्येन्द्रनाथ व गोरखनाथ-
- – भगवान शिव के उपासक नाथों के द्वारा जो साहित्य रचा गया वही नाथ साहित्य कहलाता है|
- – राहुल संकृत्यायन जी ने नाथ पंथ को सिद्धों की परंपरा का ही विकसित रूप माना है|
- – हजारी प्रसाद द्विवेदी ने नाथ पंथ या नाथ संप्रदाय को ‘सिद्ध मत, सिद्ध मार्ग, योग मार्ग, योग संप्रदाय, अवधूत मत एवं अवधूत संप्रदाय’ के नाम से पुकारा है|
रचनाकाल:-
विविध इतिहासकारों ने गोरख नाथ जी का समय निम्नानुसार निर्धारित किया है:-
- राहुल संकृत्यायन – 845 ईसवी
- हजारी प्रसाद द्विवेदी – नौवीं शताब्दी
- डा. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल- 11वीं शताब्दी
- रामकुमार वर्मा- 13 वीं शताब्दी
- रामचंद्र शुक्ल – 13 वीं शताब्दी
नोट:- नवीनतम खोजों के अनुसार गोरखनाथ जी का सर्वमान्य रचना का तेरहवीं शताब्दी का प्रारंभिक काल ही निर्धारित किया गया है |
नाथो की कुल संख्या – नौ नाथ

- आदिनाथ (भगवान शिव)
- मत्स्येन्द्रनाथ
- गोरखनाथ
- चर्पटनाथ
- गाहणीनाथ
- ज्वालेन्द्रनाथ
- चौरंगीनाथ
- भर्तृहरिनाथ
- गोपीचंदनाथ
नाथ साहित्य की विशेषताएँ
- – इस साहित्य में नारी निंदा का सर्वाधिक उल्लेख प्राप्त होता है|
- – इसमें ज्ञान निष्ठा को पर्याप्त महत्व प्रदान किया गया है|
- – इसमें मनोविकारों की निंदा की गई है|
- – इसमें सिद्ध साहित्य के भोगविलास की भर्त्सना की गई है|
- – इस साहित्य में गुरु को विशेष महत्व प्रदान किया गया है|
- – इस साहित्य में हठयोग का उपदेश प्राप्त होता है|
- – इसका रूखापन और गृहस्थ के प्रति अनादर का भाव इस साहित्य की सबसे बड़ी कमजोरी मानी जाती है|
- -मन, प्राण, शुक्र, वाक्, और कुण्डलिनी- इन पांचों के संयमन के तरीकों को राजयोग, हठयोग, वज्रयान, जपयोग या कुंडलीयोग कहा जाता है|
- -हठयोग- गोरखनाथ के ‘सिद्ध-सिद्धान्त-पद्धति’ ग्रंथ के अनुसार ‘हठ’ शब्द में प्रयुक्त ‘ह’ का अर्थ ‘सूर्य’ तथा ‘ठ’ का अर्थ ‘चन्द्रमा’ ग्रहण किया जाता है इन दोनों के योग को ही हठयोग कहते है|
गोरखनाथ_की_रचनाएँ:-
गुरु गोरखनाथ द्वारा रचित कुल ग्रंथों की संख्या 40 मानी जाती है परंतु डॉक्टर पीतांबर दत्त बडथ्वाल ने इनके द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या 14 मानी है|
यथा-
- सबदी ( सबसे प्रामाणिक रचना)
- पद
- प्राण संकली
- सिष्यादरसन
- नरवैबोध
- अभैमात्राजोग
- आतम-बोध
- पन्द्रह-तिथि
- सप्तवार
- मछींद्र गोरखबोध
- रोमवली
- ग्यानतिलक
- ग्यानचौंतिसा
- पंचमात्रा
विशेष
- हिंदी साहित्य में डी. लिट्. की उपाधि प्राप्त करने वाले वाले सर्वप्रथम विद्वान डॉ पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने 1942 ईस्वी में ‘गोरखबानी’ नाम से उनकी रचनाओं का संकलन किया है| इसका प्रकाशन हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के द्वारा किया गया था|
- रामचंद्र शुक्ल के अनुसार यह रचनाएं गोरख नाथ जी द्वारा नहीं अपितु उनके अनुयायियों द्वारा रची गई थी|
- गोरखनाथ ने षट्चक्रों वाला योग मार्ग हिंदी साहित्य में चलाया था |
- हजारी प्रसाद द्विवेदी ने नागरी प्रचारिणी सभा काशी के माध्यम से ” नाथ-सिद्धि की बानियाँ ” नामक पुस्तक का संपादन किया था |
6. सिद्ध (बौद्ध) साहित्य के प्रमुख कवि व उनकी रचनाए
कवि का नाम – रचना का नाम
- सरहपा- (769 ई.)- दोहाकोश
- लुइपा (773 ई.लगभग)- लुइपादगीतिका
- शबरपा (780 ई.) -1. चर्यापद , 2. महामुद्रावज्रगीति , 3. वज्रयोगिनीसाधना
- कण्हपा (820 ई. लगभग)- 1. चर्याचर्यविनिश्चय. 2. कण्हपादगीतिका
- डोंभिपा (840 ई. लगभग)- 1. डोंबिगीतिका, 2. योगचर्या, 3. अक्षरद्विकोपदेश
- भूसुकपा- बोधिचर्यावतार
- आर्यदेवपा – कावेरीगीतिका
- कंवणपा – चर्यागीतिका
- कंबलपा – असंबंध-सर्ग दृष्टि
- गुंडरीपा – चर्यागीति
- जयनन्दीपा – तर्क मुदँगर कारिका
- जालंधरपा – 1. वियुक्त मंजरी गीति, 2. हुँकार चित्त , 3. भावना क्रम
- दारिकपा – महागुह्य तत्त्वोपदेश
- धामपा – सुगत दृष्टिगीतिकाचर्या
विशेष
- – बौद्ध धर्म के वज्रयान तत्व का प्रचार करने के लिए जो साहित्य देश भाषा (जनभाषा) में लिखा गया वही सिद्ध साहित्य कहलाता है|
- – सिद्ध साहित्य बिहार से लेकर आसाम तक फैला था |
- – राहुल संकृत्यायन ने 84 सिद्धों के नामों का उल्लेख किया है जिनमें सिद्ध ‘सरहपा’ से यह साहित्य आरंभ होता है |
- – बिहार के नालंदा एवं तक्षशिला विद्यापीठ इन के मुख्य अड्डे माने जाते हैं बाद में यह ‘भोट’ देश चले गए |
- – इनकी रचनाओं का एक संग्रह महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने बांग्ला भाषा में ‘बौद्धगान-ओ- दोहा’ के नाम से निकाला |
- -मुनि अद्वयवज्र तथा मुन्नी दत्त सूरी ने सिद्धों की भाषा को ‘संधा अथवा संध्या’ बादशाह के नाम से पुकारा है जिसका अर्थ होता है -कुछ स्पष्ट वह कुछ अस्पष्ट भाषा |
- – सिद्धों की भाषा में ‘उलटबासी’ शैली का पूर्व रुप देखने को मिलता है |
- – हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सिद्ध साहित्य की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि, ” जो जनता तात्कालिक नरेशों की स्वेच्छाचारिता, पराजय या पतंग से त्रस्त होकर निराशा के गर्त में गिरी हुई थी, उनके लिए इन सिद्धों की वाणी ने संजीवनी बूंटी का कार्य किया |
- – साधना अवस्था से निकली सिद्धों की वाणी ‘चरिया गीत/ चर्यागीत’ कहलाती है |
सिद्ध साहित्य की प्रमुख विशेषताएं:-
- इस साहित्य में तंत्र साधना पर अधिक बल दिया गया |
- साधना पद्धति में शिव शक्ति के युगल रूप की उपासना की जाती है |
- इसमें जाति प्रथा एवं वर्णभेद व्यवस्था का विरोध किया गया |
- इस साहित्य में ब्राह्मण धर्म एवं वैदिक धर्म का खंडन किया गया है |
- सिद्धों में पंच मकार की दुष्प्रवृति देखने को मिलती है यथा- मांस, मछली, मदिरा, मुद्रा, मैथुन |
- सिद्ध साहित्य को मुख्यतः निम्न तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:-
- नीति या आचार संबंधित साहित्य
- उपदेश परक साहित्य
- साधना संबंधी या रहस्यवादी

