बेतिया के डिप्टी कलक्टर से डेविस द्वारा मुज़फ़्फ़रपुर के कमिश्नर को लिखी चिट्ठी (8.2.1858)

बेतिया के डिप्टी कलक्टर से डेविस द्वारा मुज़फ़्फ़रपुर के कमिश्नर को लिखी चिट्ठी (8.2.1858)
“बाग़ी सिपाहियों ने गंडक पार नहीं किया है, लेकिन खबर मिली है कि वे त्रिवेणी घाट से तराई होते हुए नेपाल की ओर निकले हैं। वहाँ हर कचहरी पर उनको स्थानीय लोगों द्वारा मदद मिल रही है।”

जिस समय लखनऊ और शेष अवध में कारवाई की तैयारी हो रही थी, उस समय कुंवर सिंह और अमर सिंह के नेतृत्व में दानापुर के बाग़ी पूरब की ओर निकल चुके थे। ढाका, पूर्णिया, रामगढ़ जैसे स्थानों पर पहले से विद्रोह हो रहे थे, जिनको संगठित करने की संभावना तलाशी जा रही थी। इसमें नेपाल की भूमिका संदिग्ध है, जो एक तरफ़ बाग़ियों के छुपने में मदद कर रही थी, दूसरी तरफ़ जंग बहादुर राणा स्वयं अपने गुरखाओं के साथ कभी पूर्णिया तो कभी लखनऊ में अंग्रेजों की मदद कर रहे थे। यह दोतरफ़ा नीति क्यों थी, इस पर चर्चा आगे होगी, लेकिन अपनी समझ से एक मन में प्रश्न बना लें कि ऐसा करने की क्या वजहें रही होंगी।
जनवरी 1858 में यह खबरें आने लगी कि चतरा (वर्तमान झारखंड) के एक दोमंजिले मकान में लगभग हज़ार बाग़ी जमा हैं। लोक-कथाओं और कुछ स्थानीय इतिहासकारों में प्रचलित है कि 2 अक्तूबर 1857 को वहाँ एक युद्ध हुआ था, जिसमें मंगल पांडे और नादिर अली लड़े थे, और वहाँ जिस स्थान पर बाग़ियों की लाशें गिरी वह हरजीवन तालाब बन गया। आज भी गीत गाए जाते हैं-
जय मंगल पांडे नादिर अली दोनों सपूत रहे
दोनों मिल कर फाँसी चढ़े हरजीवन तालाब रे।
जो अब तक का इतिहास पढ़ चुके हैं, वे इस तरह के गीतों की ऐतिहासिक त्रुटि समझते होंगे। इनका सांकेतिक महत्व ज़रूर है, लेकिन इतिहास में कुछ घाल-मेल है। ब्रिटिश दस्तावेज़ों के अनुसार सितंबर की गतिविधियाँ अलग थी, जब कलकत्ता से चली डाक को रोका गया था (जिसकी चर्चा पहले की है)। जनवरी, 1858 में यह कुंवर सिंह और अमर सिंह के साथ सिपाहियों का बुंदेलखंड और अवध की तरफ़ आना हो सकता है, या एक शाखा की गतिविधि हो सकती है। 
एक वर्णन है कि चतरा में बाग़ियों से लड़ने के लिए मेजर रिचर्डसन, भागलपुर के कमिश्नर यूल और नेपाल से रतन मान सिंह आए। वहाँ उनके प्रयास विफल रहे और बाग़ी पकड़े नहीं जा सके। 27 जनवरी, 1858 को वे बाग़ी जनकपुर की ओर बढ़े और नेपाल की तराइयों में प्रवेश कर गए। यह बात मैंने एक पंक्ति में कह दी, लेकिन ज़रा सोचिए कि एक वयोवृद्ध व्यक्ति बाग़ियों के साथ पहाड़ियों से गुजर कर मिर्ज़ापुर होते हुए सासाराम आते हैं। सोन नदी पार कर छोटानागपुर पहाड़ियों में प्रवेश करते हैं। वहाँ से उत्तर की दिशा में बचते-बचाते हुए गया से आगे तिरहुत में प्रवेश कर जनकपुर तक पहुँचते हैं। इसमें कहाँ रुके, किन लोगों का साथ मिला, इसके प्राथमिक स्रोत कहाँ मिलेंगे? ब्रिटिश ख़ुफ़िया दस्तावेज़ों में अगर मौजूद होते, तो उसी वक्त पकड़े गए होते। वहाँ किंवदंतियों की भूमिका बन जाती है।
जैसे एक किंवदंती सुनी कि तिरहुत के महाराज ने उनकी अंधराठाढ़ी से नेपाल प्रवेश करने में मदद की। जब ब्रिटिश अधिकारियों ने पूछ-ताछ की तो उनके लोग आम के बगीचों में उलझा कर उन्हें ग़लत दिशा बताते रहे।
इसी यात्रा का दस्तावेज़ पक्ष देखें तो उसकी कहानी कुछ अलग दिशा में है, या संभवतः अधूरी है। बाग़ी सिपाही रंजीत सिंह की गवाही मुझे मिली,
“हम लखनऊ के मार्टिनियर कॉलेज में डेढ़ महीने रहे। बेगम ने खुश होकर कुंवर सिंह को खिलत भेजी- एक हज़ार रुपए, सुंदर वस्त्र, दो बंदूकें और कुछ हाथी। वहाँ से हम फ़ैज़ाबाद और सूरजकुंड होते हुए अतरौलिया पहुँचे, जहाँ कंपनी सेना को हराया। मगर आज़मगढ़ में हमारी हार हुई और हमें भाग कर ग़ाज़ीपुर के मनिहारी पहुँचे। वहाँ हमारे 25-30 लोग मारे गए।
हम जैसे-तैसे गंगा पार कर शिवपुर घाट होते हुए जगदीशपुर के जंगलों में छुप गए। वहाँ अंग्रेजों से एक महीने लड़ाई चली, जिसमें हम छुप कर जगह बदलते रहे। आखिर हम वहाँ से निकल कर गहमर पहुँचे। जब पता लगा कि फिरंगी जंगलों से निकल गए, हम वापस जगदीशपुर आ गए। वहाँ धीरे-धीरे 2500 सिपाही जमा हो गए। 
वहाँ से भाग कर हमें बुला गाँव और कुआत खास जाना पड़ा, जहाँ हमारी हार हुई। हमने एक झील पार करने की कोशिश की, मगर भाग कर जुखनी की तरफ़ जाना पड़ा। वहाँ एक मंदिर था। मेरे पैरों में छाले पड़ गए थे, जब हम चुनारी के पहाड़ों से गुजर रहे थे। वहीं मैं पकड़ा गया।
मुझे पश्चाताप है कि मैं इस विद्रोह में शामिल हुआ, क्योंकि इस पूरे घटनाक्रम में मेरा जीवन संघर्ष और दुख से ही भरा रहा”
इसके आगे की कहानी निशान सिंह की गवाही में है,
“हम बराँव में छुपे थे, जब एक पट्टीदार भजन सिंह ने मुझे नहलाया-धुलाया और कहा- तुमलोग खुद तो लुट ही गए, हमें भी लुटवाओगे। 
मैं जंगल में भाग कर सो रहा था, जब आपके सवार मुझे उठा लाए”
मजिस्ट्रेट ने पूछा, “कुंवर सिंह जिंदा है या मर गया?”
“वह तो अपने घर पर ही मर गए साहब”
“गोलियों से?”
“नहीं। एक बड़ा गोला उनके दाहिने हाथ पर गिरा। उनको हाथ काटना पड़ा ताकि जहर न फैल जाए। मैंने जो बात सुनी, आपको बता रहा हूँ।

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