तैमूर लंग की आत्मकथा – तुज़ुक ए तैमूरी
तैमूर लंग की आत्मकथा (तुज़ूक ए तैमूरी) की कई तरह से अहमियत है। इसका पहला फ़ारसी अनुवाद अबु तालिब अलहुसैनी तबरिसी ने किया था जिसके आधार पर इसका अंग्रेज़ी और कई यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद किया गया है। उर्दू में इसका अनुवाद इंशा अल्लाह ख़ान इंशा ने भी किया था। हिंदी में इसका अनुवाद संवाद प्रकाशन ने प्रकाशित किया है, जिसमें कम्पोज़िंग की अनेक ग़लतियाँ है जिसकी वजह अंग्रेज़ी अनुवादकों का फ़ारसी स्क्रिप्ट से भिज्ञ ना होना भी है। जैसे वॉव (व) को दाल (द) पढ़ लिया तो उमरू से उमरद हो गया, इत्यादि।
ईरान में शिया मत की स्थापना पर एक अध्ययन के दौरान इसका हिंदी अनुवाद पढ़ा ताकि 14वीं सदी के सेंट्रल एशिया की तत्कालीन राजनैतिक, सामाजिक और क़बिलाई परिस्थितियों को समझा जा सके। इस विषय पर उस अध्ययन में बात होगी। तैमूरलंग का हिन्दोस्तान की सामाजिक रचना पर मुख़्तसर कलाम ज़रूरी है।
अमीर तैमूर ने हिन्दोस्तान में हाथियों और बंदरों का ज़िक्र कई जगहों पर किया है। इनसे किसान और बाग़बान काफ़ी परेशान रहते थे। फसलें उजड़ जातीं इसके अलावा शायद ही यहाँ के लोगों ने जंगली फलों का स्वाद लिया हो। तैमूरलंग के अनुसार इसकी ख़ास वजह यहाँ के लोगों की धार्मिक मान्यताओं में निहित है।
तैमूरलंग ने सती की घटना का आँखों देखा विवरण दिया है,, सबसे अहम है तत्कालीन समाज का जातीय विभाजन। तैमूर के अनुसार भारतीय हिंदू समाज पाँच जातियों में बाँटा हुआ था, जिसमें अछूत लोग सबसे नीचे थे। इस संदर्भ में इस बिरादरी के धर्म परिवर्तन का भी उल्लेख किया गया है। तैमूर जब मेरठ से आगे बढ़ा तो निम्न जाति के कुछ लोग उससे मिलने पहुँचे,,!
तैमूर लिखता है,
“मुझे बताया गया कि कुछ हिंदू मुझसे मिलने आए हैं और मेरी सेना में शामिल होना चाहते हैं। मुझे इस अप्रत्याशित बात से आश्चर्य हुआ। मैंने उनमें से कुछ लोगों को अपने पास बुलवाया ताकि जान सकूँ कि वह क्या कहना चाहते हैं। मेरे सिपाही उनके कुछ आदमियों को मेरे पास ले आए। मैंने दुभाषिये के द्वारा उनसे पूछा कि वह क्या चाहते हैं। उन्होंने कहा, ‘अमीर! हम जान गये हैं कि तू यहाँ से देहली पर अधिकार करने जा रहा हैं। इसलिए हम तैयार हैं कि तेरी सेना में शामिल होकर देहली पर अधिकार करने के लिये तेरी मदद करें’।,,”
तैमूर को आश्चर्य हुआ तो उन्होंने वज़ाहत की करते हुए कहा, “हम सबकी नज़रों में नीच हैं, लेकिन हमने सुना है कि जब तेरा मज़हब अपनाएँगे तो तू हमें नीच नहीं मानेगा और हम तेरे सिपाहियों की तरह हो जायेंगे। इसलिये हम तेरे पास आये हैं, ताकि तेरा मज़हब अपना कर तेरी सेना में शामिल हो जाएं और तेरी विजय के लिये तलवार चलाएं।” तैमूर ने उनसे कहा, “क्या तुम्हारा सम्बंध उस समुदाय से है, जिसे अछूत कहते हैं? उन्होंने हाँ में जवाब दिया ,,,
उन लोगों ने यह भी बताया कि वे सारी उम्र भूख का शिकार रहते हैं, ,, दूसरों का बचा-खुचा खाना और हड्डियाँ खाते हैं,, कूड़ा-करकट उठाने और गंदगी ढोने के अलावा कोई और काम नहीं करने दिया जाता।
तैमूर ने कहा कि अगर वह मुसलमान हो जायें तो वह दूसरे मुसलमानों के बराबर हो जायेंगे,, अंत में उनकी माँग पर मुस्लिम देश या मुस्लिम बाहुल्य जगहों पर ज़मीन देने का वायदा हुआ। तैमूर के साथ जुड़ा यह प्रसंग जिसका ज़िक्र 2-3 बार आया है, बहुत महत्वपूर्ण है जो भारत में धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया पर अच्छी रौशनी डालता है।
एक मज़ेदार बात यह है कि जब देहली शहर का घेराव किया गया तो प्राचीर पर एक ब्राह्मण आकर तैमूरलंग को श्राप से डराता था,, जिसे अंत में तैमूर ने गिरफ़्तार कर लिया था लेकिन चूँकि उसकी नीति यह थी कि वह धार्मिक आध्यात्मिक गुरुओं, कवियों, कारीगरों की हत्या नहीं करता था, इसलिये उसकी हत्या नहीं की।