एप्पल कंपनी का चखे हुए सेव के सिम्बल का सच

 

एप्पल कंपनी का चखे हुए सेव के सिम्बल का सच

     एलेन मैथिसन ट्यूरिंग । उनका जन्म 23 जून 1912 को ग्रेट ब्रिटेन में हुआ था । वे बचपन से हीं धावक बनने का सपना संजोए थे । वे ओलम्पिक स्तर के धावक हो सकते थे , क्योंकि उनका समय अंतराष्ट्रीय स्तर से मात्र  ग्यारह मिनट कम था । कोशिश कर उस स्तर तक पहुंचा जा सकता था , लेकिन उन्हें फूलों से एलर्जी थी । इसलिए  एलेन ट्यूरिंग मास्क पहनकर दौड़ते थे । मास्क पहनने से उन्हें मनोवांछित आक्सीजन नहीं मिल पाती थी ।इसलिए उन्होंने धावक बनने का सपना छोड़ दिया और विज्ञान के क्षेत्र में उतर गये । उन्होंने जो सिद्धांत परिपादित किया उससे कम्प्यूटर बनाने का तरीका आसान हो गया । अतः उनके इस शोध से उनको कम्प्यूटर साईंस का जनक माना गया ।


    उन दिनों द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था । प्रथम विश्व युद्ध की हार को जर्मनी पचा नहीं पाया था । इसलिए वह पूरे मनोयोग से द्वितीय विश्व युद्ध में बदला लेने के नियत से उतरा । उसने अटलांटिक महासागर में अपनी एक पनडुब्बी “ऊ बोट “उतारी । यह ऊ बोट अपनी सेनाओं को एक विशेष कोड के सहारे संदेश भेजती थी, जिसे डिकोड करने की क्षमता मित्र राष्ट्रों में किसी के पास नहीं थी । एलेन मिथिसन ट्यूरिंग ने इसे एक चैलेंज के रुप में लिया । उन्होंने थोड़े दिनों में हीं जर्मन कूटलेखों को पढ़ने में सफलता प्राप्त कर ली । अब जर्मन रणनीति का रहस्य मित्र राष्ट्रों के सामने खुल गया । जर्मन को घुटने टेकने पड़े । युद्ध जो और दो सालों तक चलना था , वह जल्द हीं समाप्त हो गया ।


    एलेन मैथिसन ट्यूरिंग में एक दुर्गुण ( उस दौर के हिसाब से ) था । वे समलैंगिक थे । 1952 में उन्होंने सार्वजनिक रुप से अपने इस दुर्गुण को स्वीकार किया । उन दिनों यह दुर्गुण नहीं एक अपराध था । उन पर समाज में अश्लीलता फैलाने का आरोप लगा । उन पर मुकदमा चला । कोर्ट में एलेन मैथिसन ट्यूरिंग ने इसे अपराध नहीं माना , बल्कि इसे अपना स्वभाव कहा । कोर्ट ने उनकी एक न सुनी । उन्हें अपराधी माना । ट्यूरिंग के सामने दो आॅप्सन रखे गये -1) उन्हें जेल होगी या 2) उन्हें रासायनिक बधियापन को झेलना होगा । एलेन मैथिसन ट्यूरिंग ने दूसरे आॅप्सन को चुना । उन्हें जेल जाने से बेहतर यह सजा लगी थी ।


    एलेन मैथिसन ट्यूरिंग को स्त्री हार्मोन के इंजेक्सन दिए जाने लगे । इस हार्मोन के चलते वे स्थायी तौर पर हमेशा के लिए नपुंसक हो गये । उनके स्तन निकल आए । एलेन ने शर्म के मारे घर से बाहर निकलना छोड़ दिया । उनका मन साईंस के अनुसंधानों में नहीं लगा । दो साल तक जलालत की जिंदगी जीने के बाद उन्होंने 7 जून 1954 को आत्म हत्या कर ली । उनके शव के पास एक चखा हुआ सेव रखा गया था । जांच के बाद उस सेव में पोटेशियम सायनायड पाया गया ।


    एलेन मैथिसन ट्यूरिंग को नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए था । उनकी गिनती न्यूटन और आईंस्टीन के साथ होनी चाहिए थी ।  किंतु उनके साथ कदाचार किया गया । उन्हें बधिया बना दिया गया , जो आज के परिपेक्ष्य में अनैतिक और मानव अधिकारों के विरुद्ध है । 2009 में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधान मंत्री ने इसे मानवता के खिलाफ माना था और इस कृत्य के लिए सार्वजनिक रुप से माफी भी मांगी थी । इस बात को एप्पल कम्पनी के मालिक स्टीव जाॅब्स ने 1977 में हीं मान ली थी । उन्होंने एलेन मैथिसन ट्यूरिंग को श्रद्धांजलि स्वरुप अपनी कम्पनी का लोगो “चखा हुआ सेव ” रखा था । इतना सब होने के बावजूद ट्यूरिंग ने जो जलालत सही उसकी भरपाई नितांत हीं मुश्किल है । वे ये सब देखने आने से रहे ।

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