‘ग़दर का गद्दार’
एक तरफ़ हैवलॉक कानपुर से लखनऊ की ओर बढ़ रहे थे, और दूसरी तरफ़ निकोलसन पंजाब से दिल्ली की ओर बढ़ रहे थे। हैवलॉक अगर अच्छे रणनीतिकार थे, तो निकोलसन एक क्रूर दमनकारी जिन्होंने कुछ ही दिनों पहले पेशावर में भारतीयों को तोप से बाँध कर उड़ाया था। वह किसी संधि या उदारता में विश्वास नहीं करते।
एक उदाहरण है कि जब वह दिल्ली आए, तो दो अफ़ग़ानी लोग छावनी में एक अंग्रेज़ महिला मिसेज नीसन को लेकर आए। वह दिल्ली में बच गए कुछ ही अंग्रेजों में थी, और पठान पुरुष की वेशभूषा में रह रही थी। उन अफ़ग़ानियों को जब जनरल हडसन ने ईनाम देना चाहा तो उन्होंने यह कह कर मना कर दिया, “हमने यह इंसानियत के लिए किया, ईनाम के लिए नहीं”
निकोलसन ने कहा, “इन पर कभी भरोसा मत करना। ये सभी एक जैसे मक्कार हैं। यह औरत भले अंग्रेज़ है, मगर इनकी ख़ुफ़िया होगी। निकाल बाहर करो यहाँ से!”
वाकई मिसेज नीसन को छावनी से निकाल दिया गया, और वह वहाँ से जैसे-तैसे अंबाला पहुँची। उसके बाद निकोलसन ने बख़्त ख़ान पर सीधे हमले की योजना बनायी। बख़्त ख़ान का वर्चस्व तो पहले ही कम हो गया था, मगर उन्होंने नज़फ़गढ़ झील के पास अपने 6000 लोगों की छावनी लगा रखी थी। उनका लक्ष्य था कि पंजाब की तरफ़ से आने वाले ‘सप्लाइ चेन’ को काटा जाए। उनका साथ देने के लिए सिधारी सिंह और ग़ौस मोहम्मद की टुकड़ियाँ भी वहाँ मौजूद थी।
उस दिन मूसलाधार बारिश हो रही थी, और ब्रिटिश सेना को दलदल और कमर तक पानी वाले गड्ढों से आगे बढ़ना था। मगर निकोलसन की पद्धति ही यही थी कि ऐसे कठिन हालात में जीतना अधिक आसान होता है। वह सिपाहियों के साथ दलदल में घुस गए, और सराय में स्थित भारतीय छावनी तक पहुँच गए। अंग्रेज़ सेना की अगली पंक्ति बुरी तरह मारी जाने लगी, मगर निकोलसन आगे बढ़ने का आदेश देते रहे। आखिर छावनी में हाथा-पाई शुरू हुई, और भारतीयों ने कड़ी टक्कर दी। आगे अधिकांश स्रोत लिखते हैं कि वहाँ पुल पर रणनीति बनाने में बख़्त ख़ान गुट की ग़ौस मुहम्मद और सिधारी सिंह से अन-बन हो गयी। बख़्त ख़ान अपनी बची हुई टुकड़ी लेकर वापस दिल्ली लौट आए, जबकि बाकी टुकड़ियाँ बुरी तरह मारी गयी। इसी घटना के कारण मुग़ल समर्थक और ब्रिटिश समर्थक, दोनों ही बख़्त ख़ान की छवि को कमजोर करार देते हैं। जबकि यह संभव है कि बख़्त ख़ान के लिए अपनी फ़ौज बचा कर लौटना बेहतर विकल्प लगा हो। ‘दास्तान-ए-ग़दर’ के अनुसार अपनी हार और बेइज़्ज़ती से निराश होकर बख़्त ख़ान अगले ही दिन दिल्ली छोड़ कर चले गए, मगर अन्य स्रोत इसकी पुष्टि नहीं करते।
नज़फ़गढ़ का यह युद्ध एक तरह से ‘टर्निंग प्वाइंट’ था। निकोलसन का एक विजेता रूप में स्वागत हुआ, वहीं दिल्ली से कई सिपाही अपने-अपने घर लौटने लगे। बादशाह स्वयं अपनी हार के प्रति आश्वस्त होने लगे। जबकि ऐसे हौसला गिराने की वजह नहीं थी। अगर मेरठ और बरेली के सिपाही लौटने लगे थे, तो ग्वालियर और नीमच की तरफ़ से सिपाही रोज आ भी रहे थे। संख्यात्मक बल अगस्त में भी अच्छी थी।
7 अगस्त को एक अजीब घटना हुई। चूड़ीवाला मुहल्ले में बेगम समरू हवेली थी, जहाँ बाग़ियों का बारूदखाना बनाया गया था। दोपहर को तीन बजे अचानक एक भयानक विस्फोट हुआ, और सैकड़ों शरीर आकाश में छितरा गए। वह बारूदखाना बिना किसी आक्रमण के ही फट चुका था। इस घटना में स्पष्ट षडयंत्र की बू आ रही थी। सिपाहियों ने हकीम एहसान-उल्ला-ख़ान के घर पर हमला बोल दिया और चिल्लाए, “गद्दार! तुमने हमारे महीनों की मेहनत खाक कर दी!”
यह सिद्ध करना तो कठिन है, लेकिन इसके कुछ प्रमाण मिलते हैं कि एहसान-उल्ला ख़ान के अंग्रेज़ों से ख़ुफ़िया संबंध थे। जिस तरह मुंशी जीवन लाल को ‘ग़दर का गद्दार’ कहा गया, वैसी ही छवि उनकी भी बनती है। ‘जुनून’ फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह अभिनीत किरदार कहते हैं, “दग़ाबाज़ एहसान-उल्ला की वजह से हम दिल्ली हार गए”
भारतीय सिपाहियों के गिरते मनोबल और शक्ति के कारण निकोलसन का मानना था कि अगर एक बार दिल्ली गिर गयी, पूरे भारत में विद्रोह खत्म हो जाएगा। मगर जनरल विल्सन अब भी पूर्ण आक्रमण के लिए तैयार नहीं थे। निकोलसन ने भड़क कर लिखा,
“मैंने जीवन में कई बेकार जनरल देखे, मगर इतना अज्ञानी और अड़ंगे लगाने वाला जनरल नहीं देखा”
आखिर निकोलसन की ही बात मानी गयी, और कश्मीरी गेट पर ब्रिटिशों ने क़िलाबंदी शुरू कर दी। ज़ाहिर देहलवी नाटकीय वर्णन करते हैं कि उस रात कश्मीरी दरवाज़े पर पुरबिया सिपाही भांग पीकर धुत्त पड़े थे, जब ब्रिटिशों की एक यूरोपीय टुकड़ी, दो गुरखा टुकड़ियाँ, और एक मज़हबी सिख टुकड़ी वहाँ पहुँच गयी। उन्होंने एक सोए पड़े सिपाही को पहले जगाया, “उठो भाई! गोरे आ गये हैं”
जैसे सिपाही ने आँखें खोल कर पूछा, “कौन?”, सामने खड़े एक गुरखा ने सर पर गोली मार दी।