मुझे लगता है।

मुझे लगता है।
मेरी छाप कहीं खो रही है,
मैं उसको ढुंढता हूँ, मैं उसको खोजता हूँ,
बस अपने निशां ही पाता हूँ।
कुछ लोगों ने मुझे छोड़,
मेरी पहचान गुम की।
तो कुछ को मैंने छोड़,
अपनी पहचान खो दी।
वर्तमान भी अच्छा नहीं है,
कश्मकश में कहीं हूँ फसा।
सूझ नहीं बनती, आस नहीं बनती,
मेरी तो अब अपनो से नहीं बनती।
विचारों की कहानी है, और
मेरी कोने की जवानी है।
शायद ! इसलिए,
मुझे लगता है,
मेरी पहचान खो रही है।
नरेन्द्र कुमार