बप्पा रावल

    बप्पा रावल का जन्म : अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुलफ़ज़ल व भट्ट कवियों की रचनाओं के अनुसार ईडर के राजा नागादित्य की हत्या भीलों ने कर दी थी (715 ईस्वी) तब उनका एक तीन वर्ष का बालक था, अर्थात बप्पा रावल का जन्म 712 ईस्वी में हुआ था जब महोम्मद बिन कासिम ने सिंध के राजा की हत्या की थी। इस राजकुमार का नाम बप्पा था इस बालक को भीलों से बचाने के लिये ब्राह्मणों ने इसे भांडेर नामक किले में रखा। वहाँ पर एक भील ने इनकी सहायता की पर यह स्थान भी सुरक्षित न था इसलिये ब्राह्मण उसे लेकर पाराशर नामक स्थान पर ले गये। इसके पास ही त्रिकूट पर्वत के नीचे नागेंद्र जिसे नागदा भी कहते हैं और बाद में उससे 10 मील दूर उत्तर में उदयपुर बसा, उस स्थान पर ले गये। यहाँ जंगल में शिव पूजक ब्राह्मण बहुतायत संख्या में रहते थे। उन्हीं में एक हरित या हारित ऋषि भी थे, बप्पा उनकी गायों को चराया करते थे। भट्ट ग्रंथों के अनुसार राजपूत शरद ऋतु में झूला झूलने का उत्सव बहुत उत्साह से मनाया जाता था। नागेंद्र नगर में उन दिनों सोलंकी राजाओं का राज्य था और एक दिन उन्हीं दिनों राजकुमारी अपनी सखियों के साथ झूला झूलने आई तो झूला डालने के लिये उसे रस्सी न मिली। तभी बप्पा भी वहाँ पहुँच गए तो राजकुमारी ने उनसे रस्सी लाने के लिये कहा। बप्पा ने कहा, “अगर तुम मुझसे विवाह कर लो तो मैं रस्सी ला दूंगा” राजकुमारी और बप्पा दोनों ही तब बाल्यवस्था में थे। राजकुमारी ने हाँ कर दी और बप्पा ने रस्सी ला कर देदी। झूला झूलने के पश्चात राजकुमारी के दुपट्टे और बप्पा के कंधे के पट्टे से गांठ बांध कर एक आम के वृक्ष के चारों ओर फेरे ले लिये गये। फिर सभी यह बात भूल भी गये। जब राजकुमारी विवाह योग्य हुई तो राजकुमारी के विवाह के लिये उसकी जन्मपत्री राज ज्योतिषी को दिखाई गई। राजज्योतिषी ने जन्मपत्री देखकर बताया कि राजकुमारी का विवाह तो हो चुका है। इससे सभी को बहुत आश्चर्य हुआ, फिर बप्पा को खोजा जाने लगा। बप्पा तक भी यह बात पहुँच गई, उन्होंने अपनी माँ से सुन रखा था कि वह चित्तौड़ के राजा मानसिँह मौर्य के भांजे हैं। 
    चित्तौड़ के सामंत बने बप्पा रावल: इसलिये वह चित्तौड़ चले गये, वहाँ राजा ने उनका खूब सत्कार किया और उन्हें जागीर देकर सामंत बना दिया। पर यह बात अन्य सामंतों को अच्छी न लगी। तभी 728 ईस्वी में खलीफ़ाओं की इस्लामिक सेना ने अब्दुल रहमान जुनैद-अलगारी के नेतृत्व में चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। बप्पा से चिढे हुए सामंतों ने युद्ध करने से मना कर दिया, पर जब बप्पा रावल युद्ध के लिये तैयार हुए तो यह सामंत भी साथ देने के लिये तैयार हो गये और बप्पा रावल के नेतृत्व में इस्लामिक सेना को युद्ध में बुरी तरह पराजित किया। इस युद्ध में मात्र 15-16 वर्ष के बप्पा का कुशल नेतृत्व व वीरता देखकर सामंत आश्चर्य में पड़ गये, पर बप्पा युद्ध जीतने के बाद वापस चित्तौड़ नहीं अपने पूर्वजों के देश गजनी गये। उस समय गजनी का राजा सलीम था, बप्पा ने उसे भी पराजित कर गजनी पर अधिकार कर लिया व सलीम की पुत्री से विवाह किया। फिर गजनी को अपने एक सरदार को सौंप कर वह चित्तौड़ वापस आया। राजा मानसिँह की अपेक्षा बप्पा में अधिक योग्यता देखकर सभी सामन्त अब बप्पा को राजा बनाना चाहते थे और वह हो भी गया। मानसिँह को गद्दी से उतारकर बप्पा का राज्याभिषेक हो गया।
    बप्पा रावल का अरब, फारस में अभियान : गजनी जीतने के बाद बप्पा ने वहां अपना एक प्रतिनिधि नियुक्त किया। सिर्फ यही नहीं बप्पा रावल ने कंधार समेत पश्चिम के कंधार, खुरासान, तुरान, इस्पाहन, ईरानी साम्राज्यों को जीतकर उन्हें अपने साम्राज्य में मिला लिया था। इन सभी राज्यों के मुस्लिम शासकों ने अपनी बेटियों की शादी बप्पा रावल से की, कहते है कि उन्होंने 35 मुस्लिम राजकुमारियों से विवाह किया था। वैसे तो बप्पा रावल के विषय में 32 मन की तलवार, 16 हाथ का फेंटा, 72 हाथ की धोती, 9 फुट का कद  आदि अतिश्योक्तिपूर्ण किवदंतियाँ प्रचलित हैं पर इससे इतना तो अनुमान लगता है कि वह सामान्य से अधिक विशाल शरीर के स्वामी थे। 
    बप्पा रावल का नाम कालभोज या मालभोज था ऐसा इतिहासकार मानते हैं, बप्पा या रावल उनकी उपाधी मानी जाती है। लगभग 20 वर्ष तक शासन करने के बाद उन्होंने सनातन धर्म के अनुसार निश्चित आयु में वैराग्य धारण किया और अपने पुत्र खुमाण को राज्य देकर शिव की उपासना में लग गये। महाराणा संग्राम सिंह (राणा सांगा), उदय सिंह और महाराणा प्रताप जैसे श्रेष्ठ और वीर शासक उनके ही वंश में उत्पन्न हुए थे। उन्होंने अरब की हमलावर सेनाओं को कई बार ऐसी करारी हार दी कि अगले 400 वर्षों तक किसी भी मुस्लिम शासक की हिम्मत भारत की ओर आंख उठाकर देखने की नहीं हुई। बहुत बाद में महमूद गजनवी ने भारत पर आक्रमण करने की हिम्मत की थी और कई बार पराजित हुआ था।
बप्पा रावल ने अपने विशेष सिक्के जारी किए थे। इस सिक्के में सामने की ओर ऊपर के हिस्से में माला के नीचे श्री बोप्प लेख है। बाईं ओर त्रिशूल है और उसकी दाहिनी तरफ वेदी पर शिवलिंग बना है। इसके दाहिनी ओर नंदी शिवलिंग की ओर मुख किए बैठा है। शिवलिंग और नंदी के नीचे दंडवत् करते हुए एक पुरुष की आकृति है। पीछे की तरफ सूर्य और छत्र के चिह्न हैं। इन सबके नीचे दाहिनी ओर मुख किए एक गौ खड़ी है और उसी के पास दूध पीता हुआ बछड़ा है(शायद इसी कारण इन्हे कालभोज ग्वाल कहा गया है )। ये सब चिन्ह बप्पा रावल की शिवभक्ति और उसके जीवन की कुछ घटनाओं से संबद्ध हैं।
    जवाहरी व वामपन्थी इतिहासकारों की कुटिल नीति अब जवाहरी व वामपन्थी इतिहाकारों का खेल समझिए, वर्ष 712 में मुहम्मद बिन कासिम ने राजा दाहिर को पराजित किया। परंतु उसके बाद सीधे बारहवीं शताब्दी में मुहम्मद गोरी का आक्रमण मिलता है। आठवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक क्या अरब आक्रमणकारी उस एक जीत का जश्न मना रहे थे? वास्तव में इस पूरे काल में अरब आक्रमणकारियों को भारतीय योद्धा खदेड़े हुए थे। उस कालखंड में अरबों को पराजित करने वाला एक महानायक योद्धा था बप्पा रावल।
    अरब की आंधी का सीधा सामना उस समय मेवाड़ के सैनिकों और शासकों ने देश का सीमारक्षक बनकर निभाई और भारतवर्ष के सम्मान की रक्षा की, अन्यथा देश इस्लाम की आंधी में नेस्तनाबूत हो जाता और सनातन धर्म जिसे आज हिन्दू कहा जाता है, वह अपने अस्तित्व को बचाने के लिए पारसियों और यहूदियों की भांति मातृभूमि से पृथक हो चुका होता। यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि भला हो मेवाड़ के गहलोत और भीनमाल के प्रतिहारों सहित राजस्थान के राजाओं, गुजरात के राजाओं का, जिनके कारण आज भारतवर्ष में हिन्दू स्वयं को हिन्दू कहने का अधिकार रखता है।

Leave a comment

Design a site like this with WordPress.com
Get started