1857 में हजरत महल और लक्ष्मीबाई

1857 में हजरत महल और लक्ष्मीबाई 
“मेरी मल्लिका-ए-आलम रफ़ीक-ए-सुलतान-ए-आलम मैं लखनऊ के वाक़याते हालत-ए-ज़ार जान-ए-आलम के लिए लिख रही हूँ। यहाँ के हाल दीगरदूँ हैं। देखा नहीं जाता। बुरा शगुन है। एक दिन मशहूर हुआ कि फौज बेलीगारद पर धावा करेगी….
आपस में कहने लगी कि जिस वक्त यहाँ सब का क़त्ल किया, तो जितने कलकत्ता में हैं, उनकी जान काहे को रहेगी। एक ने कहा हम तुम ही न बचेंगे, इस वास्ते कि फिरंगियों की जाल मिस्ल घास की जड़ के हैं, जितना काटो उतनी ही बढ़ती है…
मैं नहीं समझती थी कि हजरतमहल ऐसी आफ़त की परकाला है। खुद हाथी पर बैठ कर तिलंगों के आगे-आगे फिरंगियों का मुक़ाबला करती है…
गरज ये कि आलमबाग पर बड़ा मुक़ाबला रहा।…फिरंगी सरदार ओटराम और हैवलाक मुक़ाबिल थे। 40,000 फौज यहाँ जमा थी। पानी बड़े जोर का बरसा। तारीगी हो गयी पर फ़िरंगियों के तोप ने और भी गोले बरसाए। तिलंगे पलटे, मम्मू खाँ और अशरफ़ुद्दौला ने हट कर नाका चारबाग़ लिया। राजा मानसिंह ने बड़ी बहादुरी दिखायी। नौ हज़ार जमीयत से ऐसा मुक़ाबला किया कि फिरंगियों के छक्के छूट गए…
मगर ये सब तदवीरें उल्टी रही। आखिर हम सबको शिकस्त उठानी पड़ी। कानपुर से नानाराव पेशवा आया। देहली से जनरल बख़्त ख़ान रूहेला रिश्तेदार मल्क-ए-ख़ास का है। शाहज़ादा फिरोजशाह आए। अहमद रज़ा ने बड़ी बहादुरी दिखायी…
कैसर बाग़ के महलात पर गोले-बारूद गिरे। बेगमात भागी। बड़ी इफरातफरी थी। ख़ुदा वो दिन दुश्मन को भी न दिखाए…”
– सरफ़राज बेगम लखनवी का ख़त (बेगम अख़्तर महल के नाम)
अंग्रेज़ यह जानते थे कि लखनऊ जीतना कठिन होगा। वे एक ‘सेफ पैसेज’ बना कर किसी तरह रेसीडेंसी के लोगों को सुरक्षित ले जाना चाहते थे। इसके लिए यह ज़रूरी था कि रास्ते के सभी मुख्य रणनीतिक बिंदु पर कब्जा कर लें। 
सिकंदर बाग़ के बाद अंग्रेज़ों की अगली लड़ाई शाह नज़फ़ इमामबाड़ा हासिल करने की थी। मगर कैसरबाग़ और शाह नज़फ़ से इतनी गोलियाँ चल रही थी, कि उनका बढ़ना कठिन था। यह भी समझ नहीं आ रहा था कि गोली चला कौन रहा है। यह खुला मैदान न होकर लखनऊ की गलियाँ थी, और खिड़कियों या किसी ओट से छुप कर हमला हो रहा था। फिरंगी बुरी तरह मारे जा रहे थे।
जब कैम्पबेल के मुख्य सिपहसलार ऐलीसन अपना एक हाथ खो बैठे, तो उन्होंने वापस लौटने का निर्णय लिया। लेकिन इस मध्य ब्रिगेडियर होप किसी तरह शाह नज़फ़ में घुस गए, और उन्होंने देखा कि वहाँ बाग़ी वापस लौट रहे थे। शाम होने लगी थी और शाह नज़फ़ थोड़ी देर में अपने-आप ही खाली हो गया। अंग्रेज़ों ने उस पर कब्जा कर वह रात वहीं बितायी।
दूसरी तरफ़ रेसीडेंसी से हैवलॉक और आउटरैम भी अपनी सेना लेकर मोतीमहल से छत्तर मंजिल तक के सभी इमारतों पर कब्जा कर चुके थे। अब दो छोरों से बढ़ रही अंग्रेजों के ये दोनों सेनाएँ मिलने वाली थी। कैसरबाग़ से लगातार गोलियाँ चल ही रही थी, लेकिन अंततः कैम्पबेल के सामने आउटरैम और हैवलॉक आ गए।
बूढ़े और कमजोर दिख रहे हैवलॉक ने कहा, “हमें अब कैसरबाग़ पर क़ब्ज़ा कर लेना चाहिए”
कैम्पबेल ने समझाया, “अभी हमारे लिए यही उचित है कि हम सभी यूरोपीय नागरिकों को लेकर कानपुर की ओर अपनी छावनी में सुरक्षित पहुँचा दें। हम अब तक पाँच सौ से अधिक सिपाही खो चुके हैं, जिनमें पच्चीस अफ़सर थे। कैसरबाग़ के लिए हम बाद में लौटेंगे।”
19 नवंबर को यूरोपीयों को रेसीडेंसी से निकाल कर रक्त-रंजित सिकंदरबाग़ ले जाया गया, जहाँ उस वक्त भी कुछ लाशें सड़ रही थी। वहाँ बैठ कर उन्होंने चाय-नाश्ता किया। ब्रिटिश विवरण के अनुसार नवाब वाजिद अली शाह के खजाने से हथियाये गए बेशक़ीमती जेवर, पच्चीस लाख नगद और कई छोटे-बड़े हथियार रेसीडेंसी से ढोकर लाए गए। 22 नवंबर की आधी रात तक रेसीडेंसी खाली कर दी गयी।
अंग्रेज़ों को यूँ लखनऊ छोड़ कर जाता देख बाग़ियों में भी जश्न का माहौल था। उन्हें लग रहा था कि उन्होंने अंग्रेजों को पराजित कर दिया। यह बात तब अधिक पुख़्ता होने लगी जब 24 नवंबर को हैवलॉक ने बीमारी और कमजोरी से लखनऊ में ही दम तोड़ दिया। 27 नवंबर तक पूरी ब्रिटिश सेना लखनऊ मुख्य शहर छोड़ कर आलमबाग छावनी पहुँच चुकी थी।
इससे पहले कि वे दुबारा लखनऊ पर हमले की सोचते, कानपुर से जनरल विंडहैम का संदेश आया, “हमें बाग़ियों ने घेर लिया है। हमें जल्द सहयोग सेना भेजें।”
इस तरह कुछ महीने ब्रिटिश सेना पेंडुलम की तरह लखनऊ और कानपुर के मध्य झूलती रही। 

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