“आप यह न भूलें कि आप दिल्ली के बादशाह हैं।

 “आप यह न भूलें कि आप दिल्ली के बादशाह हैं।
चित्रः दिल्ली का सबसे पुराना ईसाई क़ब्रिस्तान ‘निकोलसन सीमेट्री’ जो 1857 में बना। निकोलसन की कब्र।
बादशाह के पास ताक़त तो पहले भी नहीं थी, मगर 1857 में उनका एक मनोवैज्ञानिक मूल्य था। उनकी तख्त पर बैठ कर उन्हीं को गिरफ़्तार कर लाना एक ऐसी घटना थी, जिससे पूरे दोआब के बाग़ियों का मनोबल चूर-चूर हो गया। 
20 सितंबर की रात हुमायूँ के मकबरे में बहादुर शाह ज़फ़र के पास बख़्त ख़ान आखिरी बार पहुँचे और कहा, “जहाँपनाह! आप हमारे साथ लखनऊ का रुख करें। हम यह ज़ंग जारी रखेंगे।”
हकीम एहसान-उल्ला ख़ान ने उन्हें समझाया, “आप यह न भूलें कि आप दिल्ली के बादशाह हैं। यह तो कंपनी के सिपाहियों की बग़ावत थी, जिससे आपका कोई ताल्लुक़ नहीं। मैं अंग्रेजों से बात करूँगा कि आपसे नरमी से पेश आएँ। मगर आप अब इन बाग़ियों का साथ न दें।”
अगर बादशाह बख़्त ख़ान की बात मान लेते तो शायद उस ज़िल्लत से बच जाते, जो उसके बाद हुई। लखनऊ में अब भी भारतीयों का पलड़ा भारी था, और बादशाह का वहाँ होना मोमेंटम बना कर रखता। रही बात अंग्रेजों से सजा मिलने की, वह तो यूँ भी मिल ही गयी। 
अंग्रेज़ों का पलड़ा भारी हुआ तो न सिर्फ़ एहसान-उल्ला ख़ान बल्कि बाकी ब्रिटिश-प्रेमी भी बाहर आने लगे। मिर्ज़ा इलाहे-बख़्श सीधे लाल किला पहुँचे और कैप्टन हडसन को खबर दी कि बादशाह कहाँ छुपे हैं। उन्होंने यह भी बता दिया कि बादशाह के पास बेशक़ीमती जवाहरात हैं।
मिर्ज़ा इलाहे बख़्श और मौलवी रजब अली के साथ कुछ पचास घुड़सवार लेकर कैप्टन हडसन हुमायूँ मकबरे के लिए निकले। वहाँ मौजूद कुछ जिहादियों ने जब उन पर हमला बोल दिया, तो हडसन ने इलाहे बख़्श और रजब अली को चुपके से अंदर भेजा। उन्होंने जाकर कहा,
“बादशाह सलामत! अगर आप कप्तान की बात मान लें तो आपको बाइज़्ज़त वे दिल्ली में रखेंगे। लेकिन, अगर आप नहीं माने तो ये फिरंगी गोली से उड़ा देंगे”
आखिर पालकी में बैठ कर बादशाह ज़फ़र, बेगम जीनत महल, शहज़ादा जवां बख़्त, और जीनत महल के पिता मिर्जा कुली ख़ान बाहर आए। इन पालकियों को चाँदनी चौक के रास्ते लाल किले में लाया गया। बादशाह ने रास्ते में देखा कि दिल्ली तो मरघट बन चुकी थी।
जनरल विल्सन के आदेश पर उन्हें लाल कुआँ के जीनत महल में रखा गया। उनके गार्ड कॉगहिल ने 22 सितंबर को अपने भाई को एक चिट्ठी लिखी (‘द लास्ट मुगल’ पुस्तक में उद्धृत), 
“हिंदुस्तान का बादशाह अब हमारा कैदी है…भले यह अशिष्ट लगे, लेकिन उससे पूछताछ के क्रम में मैंने उसे सूअर कहा और गालियाँ दी। अगर वह मुझसे आँखे मिला कर बात करता, तो शायद मैं उसे गोली मार देता”
अगली सुबह फिर से कैप्टन हडसन इलाहे-बख़्श और रजब अली के साथ सौ घुड़सवार लेकर निकले। रज़ब अली ने अंदर जाकर शहज़ादों मिर्ज़ा मुग़ल, अबू बकर, और खिज्र सुल्तान से बात की। वे एक बैलगाड़ी पर बाहर आए। उनके पीछे लगभग ढाई हज़ार मुसलमान चल रहे थे। खूनी दरवाज़ा तक आकर भीड़ शहज़ादों के करीब जमा होने लगी। हडसन उस समय शहज़ादों को खींच कर खूनी दरवाज़े पर लाए। उनके कपड़े उतरवाए, और तीनों को गोली मार दी। ऐसी संभावना कम लगती है कि हडसन ने ऐसा भीड़ से डर कर किया। यह एक सोची-समझी योजना लगती है, जिसका उद्देश्य ही एक दमनकारी ‘स्टेटमेंट’ देना था। मुमकिन है कि ऐसे आदेश सीधे कलकत्ता से मिल चुके हों।
अगले तीन दिनों तक शहज़ादों की लाश कोतवाली के सामने पड़ी रही, और उसके बाद ही दफ़नाया गया। हडसन ने अपने बहन को चिट्ठी लिखी, “धरती से इन दुष्टों को मिटाने में मुझे बहुत मज़ा आया”
इस घटना के अगले दिन निकोलसन ने अस्पताल में दम तोड़ा। ब्रिटिश इतिहासकार लिखते हैं कि दिल्ली जीतना निकोलसन की आखिरी इच्छा थी, जो पूरी हुई। दिल्ली वापस लेने के क्रम में कंपनी के कुल 992 सिपाही मारे गए और ढाई हज़ार से अधिक घायल हुए। अब अंग्रेजों का अगला लक्ष्य था- लखनऊ। वहाँ की ज़िम्मेदारी हैवलॉक से हस्तांतरित कर अब ऐसे व्यक्ति को दी गयी, जिन्होंने कभी नवाब वाजिद अली शाह से उनकी पगड़ी छीनी थी।
वह थे लखनऊ के पूर्व रेज़िडेंट जेम्स आउटरैम, जो फ़ारस युद्ध से भारत लौटे थे, और 15 सितंबर को कानपुर पहुँच गए। आउटरैम ने आते ही कहा, “हमें लखनऊ की बजाय पहले ग्वालियर की ओर बढ़ना चाहिए।”
उन्हें समझाया गया कि लखनऊ बचाना अधिक आवश्यक है। लेकिन भारत में चार दशक बिता चुके आउटरैम यह बात यूँ ही नहीं कह रहे थे। भले दिल्ली गिर चुकी थी, मगर ज़ंग तो अभी बाकी थी। 
 

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