सुबह का सपना
सुबह-सुबह जगा तो,
एहसास हुआ कि,
पागलपन छाया है।
रात देखा मजंर ऐसा,
मजंर था अनोखा।
रात मिले मित्र पुराने थे ।
पुराने मित्रों में,
एक थी वो।
जिस पर थी नजर मेरी,
नजर थी अलौकिक।
मानो आई कोई,
स्वर्ग की नूर।
मुस्कान थी झिलमिल-सी ,
थे रक्तरस रंजित ओष्ठ,
रंजित मुद्रा थी उसकी।
वक्त गुजरा था लम्बा,
कालेज समय में,
निहारा उसको था।
चेहरा था मुलकित-सा,
मुलकित होता था मैं।
मुलाकात-दर-मुलाकात,
होती रही उससे,
अब वियोग कि रात में ,
नहीं आते सपने मुझे,.
सपने सपने होते हैं।
यह जान गया,
पहचान गया मैं।
नरेन्द्र कुमार