भारतीय काव्यशास्त्रीय परिभाषा

।।भारतीय काव्यशास्त्रीय परिभाषायें।।


                    

1.आचार्य भरतमुनि:-
        “मृदुललितपदाढ्यं गूढ़शब्दार्थहीनं जनपदसुखबोध्यं युक्तिमन्नृत्यभोज्यम्।
          बहुरसकृतमार्गं संधिसंधानयुक्तं स भवति शुभकाव्यं नाटक प्रेक्षकाणाम्।।
अर्थ:
शुभ काव्य वह होता है जिसकी रचना कोमल और ललित शब्दों में की गई हो, जिसमें शब्द और अर्थ अधिक गूढ़ न हों, जो जन साधारण के लिए अधिक ग्राह्य हो, जो तर्कसंगत हो और जिसमें नृत्य की योजना की जा सके, जिसमें भिन्न भिन्न प्रकार के रसस्वीकार किये जा सकते हों। साथ ही जिसमें कथानक संधियों का भी पूर्ण निर्वाह किया गया हो।
2.आचार्य भामह:-
                            “शब्दार्थौ सहितौ काव्यं”
अर्थ: जिस रचना में शब्द और अर्थ दोनों का समावेश हो उसे काव्य कहते हैं।
3.दण्डी:-
                 “शरीरं तावदिष्टार्थां व्यवच्छिन्ना पदावली”
अर्थ:  जो पदावली कवि के अभिष्ट अर्थ को व्यञ्जित करती है, वही काव्य है।
4.वामन:-
                        “काव्यशब्दोयं गुणालंकार संस्कृतयो: शब्दार्थयो वर्तते”
अर्थ: गुणों तथा अलंकारों से युक्त शब्दार्थ ही काव्य है।
5.आनंदवर्धन:-
                        ” काव्यस्यात्मा ध्वनिरितिबुधैर्य: समाम्नात्पूर्व:”
अर्थ: शब्दार्थ दि काव्य का शरीर है तो ध्वनि उसकी आत्मा है।यह पहले से ही विद्वानों द्वारा मान्यता प्राप्त है।
6.कुंतक:-
                         
 “शब्दार्थौ सहितौ वक्रव्यापारशालिनी,
                 बंधे व्यवस्थितौ काव्यं तद्विदाह्लादकारिणी।”
अर्थ: काव्य मर्मज्ञों को आह्लाद देने वाले वक्र कवि व्यापार युक्त रचना में व्यवस्थित शब्द और अर्थ मिलकर काव्य कहलाते हैं।
7.आचार्य भोज:-
                                    “निर्दोषं गुणवत् काव्यमलंकारैरकृतम्।
                                    रसान्वितं कविं कुर्वन् कीर्तिं प्रीतिञ्च विन्दति।।”
अर्थ: दोषरहित गुणयुक्त अलंकारयुक्त तथा रसयुक्त काव्य कीर्ति और सुख देने वाला है।
8.मम्मट:-
                                 “तद्दोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृति पुन: क्वापि।”
अर्थ:  दोषरहित गुणसहित शब्दार्थ काव्य है, चाहे उसमें अलंकारों का प्रयोग न भी हो।
9.आचार्य विश्वनाथ:-
                                             “वाक्यं रसात्मकं काव्यम्।”
अर्थ:  रसमय वाक्य ही काव्य है।
10.पंडित जगन्नाथ:-
                                                 “रमणीयार्थं प्रतिपादक: शब्द: काव्यम्।
अर्थ: रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाला वाक्य ही काव्य है।
11.गोस्वामी तुलसीदास:-
                                             जे कबित्त बुध नहिं आदरहिं। सो स्रम बादि बाल कवि करहिं।।
                                              कीरति भनिति भूति भल सोई।सुरसरि सम सब कहं हित होई।।   
         ।। रीतिकालीन आचार्यों की परिभाषायें।।

1.केशवदास:-
                 जदपि सुजाति सुलच्छनी सुबरन सरस सुवृत्त।
                 भूषन बिनु न बिराजइ कविता बनिता नित्त।।
2.कुलपति मिश्र:-
                 जग तें अद्भुत सुख सदन सब्दरु अर्थ कवित्त।
                 यह लच्छन मैंने कियो समुझि ग्रंथ बहु चित्त।।
3.चिंतामणि:- 
                  सगुण अंकारन सहित दोषरहित जो होई।
                  शब्द अर्थ वारौ कवित्त बिबुध कहत सब कोई।।
4.देव:-
                   सब्द जीव तिहि अरथ मन रसमय सुजस सरीर।
                   चलत बहै जुग छंद गति अलकार गम्भीर।।
5.सुरति मिश्र:-
                   बरनन मनरंजन जहां रीति अलौकिक होई।
                   निपुण कर्म कवि कौ जु तिहिं काव्य कहत सब कोई।।
                               ।।आधुनिक मत।।
1.महावीर प्रसाद द्विवेदी:- 
                “कविता प्रभावशाली रचना है जो श्रोता या पठक के मन पर  आनंदमय प्रभाव डालती है।”
                 “सादगी असियत और जोश आदि ये तीनों गुण कविता में हों तो कहना ही क्याहै?परंतु बहुधा अच्छी कविता मेंकेवल जोश रहता है, सादगी और असलियत नहीं। परंतु बिना असलियत के जोश का होना बहुत कठिन है। अतएव कवि कोअसलियत का सबसे अधिक ध्यान रखना चाहिए।”
2.आचार्य रामचंद्र शुक्ल:-
                  “जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रस दशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्दविधान करती आई है उसे कविता कहते हैं।”
3.बाबू श्यामसुंदर दास:-
                    “हम किसी पुस्तक को काव्य की संज्ञा तभी दे सकते हैं अगर वह कला के उद्देश्यों को पूरा करती है।”
4.जयशंकर प्रसाद:-
                    “काव्य आत्मा की संकल्पात्मक अनुभूति है जिसका संबंध विश्लेषण विकल्प या विज्ञान से नहीं है। वह एक श्रेयमयी प्रेय रचना है।”
5.महादेवी वर्मा:-
                    “कविता कवि विशेष की भावनाओं का चित्रण हैऔर वह चित्ण इतना ठीक है कि उसमें वैसी ही भावनाएं किसी दूसरे के हृदय में आविर्भूत होती हैं।”
6.पंत:-
                    “साहित्य या काव्य जीवन की आलोचना है।चाहे वह निबंध काव्य या कहानी कोई भी रचना क्यों न हो, उसे हमारे जीवन की व्याख्या करनी चाहिए।”
7.धूमिल:- 
                    “कविता शब्द की अदालत में मुजरिम के कटघरे में खड़े बेकसूर आदमी का हलफनामा है।”

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